देहरादून। एमडीडीए को उत्तराखंड के “सर्वाधिक भ्रष्ट” विभागों में गिना जाता है।
अलबत्ता, गुजरे 5 से 7 सालों में इस महकमे में कुछ दमदार अफसरों की नियुक्ति होने के बाद से इसकी छवि में सुधार देखने को मिल रहा था लेकिन अब हालात फिर वही ढाक के तीन पात वाले होने लगे हैं।
शहर में बीते कुछ समय से एमडीडीए के अभियंताओं के फिर जोर शोर से चर्चे होने लगे हैं। शहर के बाशिंदों के बीच इस प्राधिकरण को लेकर त्राहिमाम वाली स्थिति बननी लगी है। खुलेआम में शहर में जिस तरह से दशक भर पहले अवैध निर्माण होते थे इन दिनों फिर वही ट्रेंड तेजी से शुरू हो गया है।
हाल ये हैं, अब काम्प्लेक्स आदि के नक्शे पास कराने पर ज्यादा जोर नहीं दिख रहा। बल्कि या तो अवैध निर्माण को प्रश्रय दिया जा रहा है या फिर नक्शे में पार्किंग समेत तमाम जरूरी मानकों का पालन नहीं कराया जा रहा। कुल मिलाकर गलत कामों को खूब छूट दी जा रही है।
अवैध प्लॉटिंग का धंधा भी इस समय जोर शोर से चल रहा है। प्राधिकरण से ले आउट पास कराने के बजाय लेनदेन पर ज्यादा जोर है। बीते कुछ दिनों का रिकॉर्ड बताता है कि अवैध प्लॉटिंग पर सबसे कम कार्रवाई इसी समय मे हो रही है।
बाजारों में संकरी गलियों में खुलेआम व्यावसायिक निर्माण धड़ल्ले से हो रहे हैं। मुख्य बाजारों में हालात सबसे ज्यादा खराब हैं। आवासीय नक्शों को भी पास कराने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई जा रही।
प्राधिकरण को बीते सालों में पेपर लेस बनाने और ऑनलाइन प्रणाली पर जोर दिया गया था वो भी अब औंधे मुँह गिरने लगा है। फ़ाइलों के ढेर mdda में हर अनुभाग में फिर देखने को मिलेंगे। कुल मिलाकर अराजकता वाली स्तिथि बनी हुई है।
प्राधिकरण में इधर के समय मे दूसरे विभागों से आये नए engineers का पूरा फोकस माल कमाने पर है। शहर में इनके खूंखार होते इरादों के जमकर चर्चे हैं। बकायदा नाम लेकर लोग कह रहे कि फलां फलां से बचकर रहना।

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